आज के अविश्वास प्रस्ताव को अच्छे से देखा और सुना (टीवी पर हीं सही) पर ऐसा लगता है कि विपक्ष का नेतृत्व करने वाले राहुल गांधी में maturity अब नहीं आ पाएगी। जब वे संसद में भाषण दे रहे थे, तो मैंने सोचा था कि चूंकि देश के अधिकांश लोग उनकी काफी आलोचना करते रहते हैं, इसलिए स्वस्थ लोकतंत्र के तकाजे से आज उन्हें उनके अच्छे भाषण के लिए बधाई भी दूंगा। एक आम नागरिक हीं हूँ लेकिन एक आम नागरिक की बधाई और उसका समर्थन हीं एक नेता के कांधों को मजबूती देता है। लेकिन उस अच्छे भाषण के बाद जिस तरह से वे प्रधानमंत्री मोदी से जाकर चिपट/लिपट लिए, उसे कांग्रेसी दोस्त भले राजनीतिक शिष्टाचार की अनोखी मिसाल बताएंगे, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि ऐसा करके अपने अच्छे भाषण और संवेदनशील आरोपों की गंभीरता को उन्होंने खुद ही समाप्त कर दिया। चलिये अब point to point बात करते हैं:
1. पीएम से चिपटकर खुद ही ख़त्म कर ली आरोपों की गंभीरता
संवेदनशील सवालों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना एक बात है, राजनीतिक शिष्टाचार दूसरी बात है. राहुल जी ने जो गंभीर आरोप लगाए थे, उनपर कम से कम 24 घंटे तो स्टैंड करते और मीडिया (जिसके अभी के हालत से सब भली भांति परिचित हैं) में उनपर बहस होने देते, सरकार का उनपर जवाब आने देते, जनता को उनपर मंथन करने देते। लेकिन भाषण समाप्त करते ही वे जिस तरह से प्रधानमंत्री से जबरदस्ती गले मिले, उससे माहौल में हल्कापन आ गया। मीडिया में अब उनके भाषण से अधिक इस गला-मिलन की चर्चा होगी, बीजेपी के नेता उनके आरोपों को हल्के में उड़ा देंगे और लोग इसका मज़ाक उड़ाएंगे।
भाषण के बाद पीएम मोदी के गले लगे राहुल
यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे एक परीक्षार्थी परीक्षा में बहुत अच्छी कॉपी लिखता है और परीक्षा खत्म होने की घंटी बजने से ठीक पहले कॉपी में सारे पन्नों को क्रॉस कर देता है। और अगर कोई परीक्षार्थी ऐसा करता है, तो आप ही बताइए वह कैसे पास होगा?
2. हिन्दुत्व की परिभाषा में भी चूक गए राहुल
राहुल गांधी ने हिन्दुत्व को लेकर जो बातें कहीं, वह भी लोगों को सहमत कर पाएगी, इसमें मुझे संदेह है। मुझे लगता है कि अगर बीजेपी-आरएसएस के उग्र हिन्दुत्व को लेकर जनता के मन में संशय है, तो कांग्रेस-राहुल के इस सॉफ्ट हिन्दुत्व को भी आज के हिन्दू स्वीकार नहीं कर पाएंगे। राहुल गांधी ने कहा कि कोई आपको कितनी भी गालियां दे, पप्पू कहे, आपसे नफरत करे, हम आपसे गले मिलेंगे, आपसे प्यार करेंगे, यही हिन्दुत्व है।
मुझे लगता है कि हिन्दुत्व न तो किसी को गाली देने का नाम है, न किसी से गालियां खाने का नाम है। हिन्दुत्व न तो किसी को प्रताड़ित करने का नाम है, न किसी से प्रताड़ित होते रहने का नाम है। हिन्दुत्व न तो किसी का मज़ाक उड़ाने का नाम है, न किसी से मज़ाक बनते रहने का नाम है। इस लिहाज से मेरा ख्याल है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों को अपने-अपने हिन्दुत्व पर विचार करना चाहिए। सच्चाई यह है कि असली हिन्दुत्व इन दोनों के हिन्दुत्व से अलग है और वोट बैंक की राजनीति में हमारे नेता देश के आम हिन्दुओं के असली मुद्दों, भावनाओं और खूबियों को समझने में नाकाम साबित हो रहे हैं। और यही बातें मेरे ख्याल से सभी धर्मों पर लागू होती हैं।
3. फ्रांस के राष्ट्रपति से निजी बातचीत का हवाला देना अनुचित।
राहुल गांधी की अपरिपक्वता एक जगह और दिखी, जब उन्होंने अपने भाषण में फ्रांस के राष्ट्रपति से अपनी एक निजी बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि राफाएल डील कोई सीक्रेट डील नहीं है और इसका दाम सार्वजनिक किया जा सकता है। मुझे लगता है कि शायद इस कथित व्यक्तिगत बातचीत (जिसका भी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है) के आधार पर भारत की संसद में फ्रांस के राष्ट्रपति को घसीट लाना राजनीतिक/कूटनीतिक/नैतिक/व्यावहारिक किसी भी लिहाज से उचित नहीं है।
4. हरसिमरत कौर की तरफ इशारा नहीं करना था
राहुल गांधी ने डिबेट दोबारा बहाल होने के बाद भाषण में यह कहकर तो अच्छा दांव खेला कि आपके (बीजेपी के) सांसद भी मुझे कह रहे हैं कि आपने बहुत अच्छा बोला। लेकिन यह कहते-कहते वह बहक गए और अकाली दल की हरसिमरत कौर की तरफ इशारा करके कहा कि जब मैं बोल रहा था, तो वे भी मुस्कुरा रही थीं। इस तरह की बातों से न सिर्फ आपके भाषण की गंभीरता खत्म होती है, बल्कि मामला व्यक्तिगत स्तर पर उतर आता है और आपके कहे से जो suspense create हो सकता था, वह भी खत्म हो जाता है।
5. अभिनेत्री प्रिया के आंख मारने से तुलना होने लगी
राहुल गांधी को समझना होगा कि संसद जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म पर आपकी बॉडी लैंग्वेज, आपका व्यवहार, आपका एक-एक शब्द किस प्रकार आपकी छवि को प्रभावित कर सकता है। राहुल गांधी ने बैठे-बैठे कुछ ऐसे आंख मारी, कि कुछ मीडिया चैनलों (जिसके अभी के हालत से सब भली भांति परिचित हैं) पर एक क्षेत्रीय अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वारियर के आंख मारने से तुलना होने लगी और दोनों के वीडियोज़ 2 window में चलने लगे। इस प्रकार एक गंभीर भाषण के बाद उनका अच्छा-खासा मखौल उड़ गया।
अब मैं कोई भक्त नहीं हूँ। और ना ये साधारण सा लेख किसी के विरोध केलिए लिखा गया है। ये एक आम भारतीय नागरिक की समीक्षा है आज के अविश्वास प्रस्ताव पर हुए बहस के सब से प्रमुख बिंदु पर। अब इसका निष्कर्ष यही है कि विपक्ष को एक अच्छे दमदार नेतृत्व की ज़रूरत है। उन्हें दिया ले कर उसकी तलाश शुरू कर देनी चाहिए। सरकार बनाने केलिए नहीं, बल्कि देश कुशल तरीके से चलाने केलिए। फिर चाहे कुर्सी प्रधानमंत्री की हो या विपक्ष की।
1. पीएम से चिपटकर खुद ही ख़त्म कर ली आरोपों की गंभीरता
संवेदनशील सवालों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना एक बात है, राजनीतिक शिष्टाचार दूसरी बात है. राहुल जी ने जो गंभीर आरोप लगाए थे, उनपर कम से कम 24 घंटे तो स्टैंड करते और मीडिया (जिसके अभी के हालत से सब भली भांति परिचित हैं) में उनपर बहस होने देते, सरकार का उनपर जवाब आने देते, जनता को उनपर मंथन करने देते। लेकिन भाषण समाप्त करते ही वे जिस तरह से प्रधानमंत्री से जबरदस्ती गले मिले, उससे माहौल में हल्कापन आ गया। मीडिया में अब उनके भाषण से अधिक इस गला-मिलन की चर्चा होगी, बीजेपी के नेता उनके आरोपों को हल्के में उड़ा देंगे और लोग इसका मज़ाक उड़ाएंगे।
भाषण के बाद पीएम मोदी के गले लगे राहुल
यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे एक परीक्षार्थी परीक्षा में बहुत अच्छी कॉपी लिखता है और परीक्षा खत्म होने की घंटी बजने से ठीक पहले कॉपी में सारे पन्नों को क्रॉस कर देता है। और अगर कोई परीक्षार्थी ऐसा करता है, तो आप ही बताइए वह कैसे पास होगा?
2. हिन्दुत्व की परिभाषा में भी चूक गए राहुल
राहुल गांधी ने हिन्दुत्व को लेकर जो बातें कहीं, वह भी लोगों को सहमत कर पाएगी, इसमें मुझे संदेह है। मुझे लगता है कि अगर बीजेपी-आरएसएस के उग्र हिन्दुत्व को लेकर जनता के मन में संशय है, तो कांग्रेस-राहुल के इस सॉफ्ट हिन्दुत्व को भी आज के हिन्दू स्वीकार नहीं कर पाएंगे। राहुल गांधी ने कहा कि कोई आपको कितनी भी गालियां दे, पप्पू कहे, आपसे नफरत करे, हम आपसे गले मिलेंगे, आपसे प्यार करेंगे, यही हिन्दुत्व है।
मुझे लगता है कि हिन्दुत्व न तो किसी को गाली देने का नाम है, न किसी से गालियां खाने का नाम है। हिन्दुत्व न तो किसी को प्रताड़ित करने का नाम है, न किसी से प्रताड़ित होते रहने का नाम है। हिन्दुत्व न तो किसी का मज़ाक उड़ाने का नाम है, न किसी से मज़ाक बनते रहने का नाम है। इस लिहाज से मेरा ख्याल है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों को अपने-अपने हिन्दुत्व पर विचार करना चाहिए। सच्चाई यह है कि असली हिन्दुत्व इन दोनों के हिन्दुत्व से अलग है और वोट बैंक की राजनीति में हमारे नेता देश के आम हिन्दुओं के असली मुद्दों, भावनाओं और खूबियों को समझने में नाकाम साबित हो रहे हैं। और यही बातें मेरे ख्याल से सभी धर्मों पर लागू होती हैं।
3. फ्रांस के राष्ट्रपति से निजी बातचीत का हवाला देना अनुचित।
राहुल गांधी की अपरिपक्वता एक जगह और दिखी, जब उन्होंने अपने भाषण में फ्रांस के राष्ट्रपति से अपनी एक निजी बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि राफाएल डील कोई सीक्रेट डील नहीं है और इसका दाम सार्वजनिक किया जा सकता है। मुझे लगता है कि शायद इस कथित व्यक्तिगत बातचीत (जिसका भी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है) के आधार पर भारत की संसद में फ्रांस के राष्ट्रपति को घसीट लाना राजनीतिक/कूटनीतिक/नैतिक/व्यावहारिक किसी भी लिहाज से उचित नहीं है।
4. हरसिमरत कौर की तरफ इशारा नहीं करना था
राहुल गांधी ने डिबेट दोबारा बहाल होने के बाद भाषण में यह कहकर तो अच्छा दांव खेला कि आपके (बीजेपी के) सांसद भी मुझे कह रहे हैं कि आपने बहुत अच्छा बोला। लेकिन यह कहते-कहते वह बहक गए और अकाली दल की हरसिमरत कौर की तरफ इशारा करके कहा कि जब मैं बोल रहा था, तो वे भी मुस्कुरा रही थीं। इस तरह की बातों से न सिर्फ आपके भाषण की गंभीरता खत्म होती है, बल्कि मामला व्यक्तिगत स्तर पर उतर आता है और आपके कहे से जो suspense create हो सकता था, वह भी खत्म हो जाता है।
5. अभिनेत्री प्रिया के आंख मारने से तुलना होने लगी
राहुल गांधी को समझना होगा कि संसद जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म पर आपकी बॉडी लैंग्वेज, आपका व्यवहार, आपका एक-एक शब्द किस प्रकार आपकी छवि को प्रभावित कर सकता है। राहुल गांधी ने बैठे-बैठे कुछ ऐसे आंख मारी, कि कुछ मीडिया चैनलों (जिसके अभी के हालत से सब भली भांति परिचित हैं) पर एक क्षेत्रीय अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वारियर के आंख मारने से तुलना होने लगी और दोनों के वीडियोज़ 2 window में चलने लगे। इस प्रकार एक गंभीर भाषण के बाद उनका अच्छा-खासा मखौल उड़ गया।
अब मैं कोई भक्त नहीं हूँ। और ना ये साधारण सा लेख किसी के विरोध केलिए लिखा गया है। ये एक आम भारतीय नागरिक की समीक्षा है आज के अविश्वास प्रस्ताव पर हुए बहस के सब से प्रमुख बिंदु पर। अब इसका निष्कर्ष यही है कि विपक्ष को एक अच्छे दमदार नेतृत्व की ज़रूरत है। उन्हें दिया ले कर उसकी तलाश शुरू कर देनी चाहिए। सरकार बनाने केलिए नहीं, बल्कि देश कुशल तरीके से चलाने केलिए। फिर चाहे कुर्सी प्रधानमंत्री की हो या विपक्ष की।