Friday, July 20, 2018

विपक्ष को करनी होगी एक मज़बूत नेता की तलाश

आज के अविश्वास प्रस्ताव को अच्छे से देखा और सुना (टीवी पर हीं सही) पर ऐसा लगता है कि विपक्ष का नेतृत्व करने वाले राहुल गांधी में maturity अब नहीं आ पाएगी। जब वे संसद में भाषण दे रहे थे, तो मैंने सोचा था कि चूंकि देश के अधिकांश लोग उनकी काफी आलोचना करते रहते हैं, इसलिए स्वस्थ लोकतंत्र के तकाजे से आज उन्हें उनके अच्छे भाषण के लिए बधाई भी दूंगा। एक आम नागरिक हीं हूँ लेकिन एक आम नागरिक की बधाई और उसका समर्थन हीं एक नेता के कांधों को मजबूती देता है। लेकिन उस अच्छे भाषण के बाद जिस तरह से वे प्रधानमंत्री मोदी से जाकर चिपट/लिपट लिए, उसे कांग्रेसी दोस्त भले राजनीतिक शिष्टाचार की अनोखी मिसाल बताएंगे, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि ऐसा करके अपने अच्छे भाषण और संवेदनशील आरोपों की गंभीरता को उन्होंने खुद ही समाप्त कर दिया। चलिये अब point to point बात करते हैं:

1. पीएम से चिपटकर खुद ही ख़त्म कर ली आरोपों की गंभीरता

संवेदनशील सवालों पर सरकार को कठघरे में खड़ा करना एक बात है, राजनीतिक शिष्टाचार दूसरी बात है. राहुल जी ने जो गंभीर आरोप लगाए थे, उनपर कम से कम 24 घंटे तो स्टैंड करते और मीडिया (जिसके अभी के हालत से सब भली भांति परिचित हैं) में उनपर बहस होने देते, सरकार का उनपर जवाब आने देते, जनता को उनपर मंथन करने देते। लेकिन भाषण समाप्त करते ही वे जिस तरह से प्रधानमंत्री से जबरदस्ती गले मिले, उससे माहौल में हल्कापन आ गया।  मीडिया में अब उनके भाषण से अधिक इस गला-मिलन की चर्चा होगी, बीजेपी के नेता उनके आरोपों को हल्के में उड़ा देंगे और लोग इसका मज़ाक उड़ाएंगे।

भाषण के बाद पीएम मोदी के गले लगे राहुल
यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जैसे एक परीक्षार्थी परीक्षा में बहुत अच्छी कॉपी लिखता है और परीक्षा खत्म होने की घंटी बजने से ठीक पहले कॉपी में सारे पन्नों को क्रॉस कर देता है। और अगर कोई परीक्षार्थी ऐसा करता है, तो आप ही बताइए वह कैसे पास होगा?

2. हिन्दुत्व की परिभाषा में भी चूक गए राहुल

राहुल गांधी ने हिन्दुत्व को लेकर जो बातें कहीं, वह भी लोगों को सहमत कर पाएगी, इसमें मुझे संदेह है। मुझे लगता है कि अगर बीजेपी-आरएसएस के उग्र हिन्दुत्व को लेकर जनता के मन में संशय है, तो कांग्रेस-राहुल के इस सॉफ्ट हिन्दुत्व को भी आज के हिन्दू स्वीकार नहीं कर पाएंगे। राहुल गांधी ने कहा कि कोई आपको कितनी भी गालियां दे, पप्पू कहे, आपसे नफरत करे, हम आपसे गले मिलेंगे, आपसे प्यार करेंगे, यही हिन्दुत्व है।
मुझे लगता है कि हिन्दुत्व न तो किसी को गाली देने का नाम है, न किसी से गालियां खाने का नाम है। हिन्दुत्व न तो किसी को प्रताड़ित करने का नाम है, न किसी से प्रताड़ित होते रहने का नाम है। हिन्दुत्व न तो किसी का मज़ाक उड़ाने का नाम है, न किसी से मज़ाक बनते रहने का नाम है। इस लिहाज से मेरा ख्याल है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों को अपने-अपने हिन्दुत्व पर विचार करना चाहिए। सच्चाई यह है कि असली हिन्दुत्व इन दोनों के हिन्दुत्व से अलग है और वोट बैंक की राजनीति में हमारे नेता देश के आम हिन्दुओं के असली मुद्दों, भावनाओं और खूबियों को समझने में नाकाम साबित हो रहे हैं। और यही बातें मेरे ख्याल से सभी धर्मों पर लागू होती हैं।

3. फ्रांस के राष्ट्रपति से निजी बातचीत का हवाला देना अनुचित।

राहुल गांधी की अपरिपक्वता एक जगह और दिखी, जब उन्होंने अपने भाषण में फ्रांस के राष्ट्रपति से अपनी एक निजी बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि राफाएल डील कोई सीक्रेट डील नहीं है और इसका दाम सार्वजनिक किया जा सकता है। मुझे लगता है कि शायद इस कथित व्यक्तिगत बातचीत (जिसका भी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है) के आधार पर भारत की संसद में फ्रांस के राष्ट्रपति को घसीट लाना राजनीतिक/कूटनीतिक/नैतिक/व्यावहारिक किसी भी लिहाज से उचित नहीं है।

4. हरसिमरत कौर की तरफ इशारा नहीं करना था

राहुल गांधी ने डिबेट दोबारा बहाल होने के बाद भाषण में यह कहकर तो अच्छा दांव खेला कि आपके (बीजेपी के) सांसद भी मुझे कह रहे हैं कि आपने बहुत अच्छा बोला। लेकिन यह कहते-कहते वह बहक गए और अकाली दल की हरसिमरत कौर की तरफ इशारा करके कहा कि जब मैं बोल रहा था, तो वे भी मुस्कुरा रही थीं। इस तरह की बातों से न सिर्फ आपके भाषण की गंभीरता खत्म होती है, बल्कि मामला व्यक्तिगत स्तर पर उतर आता है और आपके कहे से जो suspense create हो सकता था, वह भी खत्म हो जाता है।

5. अभिनेत्री प्रिया के आंख मारने से तुलना होने लगी

राहुल गांधी को समझना होगा कि संसद जैसे महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म पर आपकी बॉडी लैंग्वेज, आपका व्यवहार, आपका एक-एक शब्द किस प्रकार आपकी छवि को प्रभावित कर सकता है। राहुल गांधी ने बैठे-बैठे कुछ ऐसे आंख मारी, कि कुछ मीडिया चैनलों (जिसके अभी के हालत से सब भली भांति परिचित हैं) पर एक क्षेत्रीय अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वारियर के आंख मारने से तुलना होने लगी और दोनों के वीडियोज़ 2 window में चलने लगे। इस प्रकार एक गंभीर भाषण के बाद उनका अच्छा-खासा मखौल उड़ गया।

अब मैं कोई भक्त नहीं हूँ। और ना ये साधारण सा लेख किसी के विरोध केलिए लिखा गया है। ये एक आम भारतीय नागरिक की समीक्षा है आज के अविश्वास प्रस्ताव पर हुए बहस के सब से प्रमुख बिंदु पर। अब इसका निष्कर्ष यही है कि विपक्ष को एक अच्छे दमदार नेतृत्व की ज़रूरत है। उन्हें दिया ले कर उसकी तलाश शुरू कर देनी चाहिए। सरकार बनाने केलिए नहीं, बल्कि देश कुशल तरीके से चलाने केलिए। फिर चाहे कुर्सी प्रधानमंत्री की हो या विपक्ष की।

Tuesday, September 15, 2015



हिंदी बोलिए त फाइन कर देता है !


हिंदी दिवस हिंदी भाषियों के लिए रोना रोने का मौका बनकर रह गया है। जबकि ज़रूरत इस बात की है कि दुनिया को हिंदी भाषा की महानता के बारे में बताया जाए। उन गुणों के बारे में बताया जाए जो किसी और भाषा में नहीं है। जैसे-

उदारता - पूरी दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां लोग अपनी मातृ भाषा के लिए गर्व से कहते हैं कि मुझे हिंदी नहीं आती। मैं हिंदी अखबार नहीं पढ़ता। जहां एक-दूसरे को ‘हिंदीवाला’ कहकर टोंट मारते हैं। एक दिन बोरिंग रोड पटना के एक ऑटो रिक्शा में एक पूजनीय आंटी जी को दूसरी आंटी से कहते सुना (गर्व से) "अरे जानती हैं मेरा गोलुआ का स्कूल तो गज़ब है एकदम ! हिंदी बोलिए त फाइन कर देता है !" अब ये हिंदी भाषा की उदारता नहीं तो क्या है, जो अपने ही लोगों का अपना मज़ाक उड़ाने की इतनी छूट देती है।

मूर्खों की निशानदेही - किसी भी समाज में सबसे बड़ी चुनौती वहां के बुद्धिजीवी खड़ी करते हैं। भारतीय समाज में हिंदी भाषी को सिरे से मूर्ख मान लेने से ये बौधिक प्रतिस्पर्धा काफी कम हो गई है। एक तो वैसे भी मौके बहुत कम है ऐसे में अंग्रेज़ी न जानने को ‘अयोग्यता’ न माना जाता, तो सोचिए ज़रा, नौकरियों के लिए कितनी मारकाट मचती।

गालियों की भाषा - किसी भी इंसान की असली भाषा वो होती है जिसमें वो गालियां देता है। इस लिहाज़ से देखा जाए तो हिंदी भाषा को अभी कुछ हजार साल तक और कोई हिलाने वाला नहीं। अब तो मोदी जी ने भी बता दिया कि गुजरात मे व्यापारी भी झगड़ों में असर लाने के लिए हिंदी में बोलने लगते हैं। हमने विज्ञान, तकनीक, आईटी की भाषा भले ही अंग्रेज़ी बना दी हो मगर आज भी बड़े-से बड़ा आदमी भी गुस्से के चरमपलों में जब तक हिंदी भाषा में सामने वाले के पारिवारिक सदस्यों को याद न कर ले, तब तक उसे चैन नहीं आता।

हिंदी का ब्रांड - भारत में देसी-विदेशी इतनी भाषाएं बोली जाती हैं मगर उन्हें बोलने वालों को ब्रांड का दर्जा हासिल नहीं है। हिंदी भाषी इकलौता आदमी है जिसे ‘एचएमटी’ कहा जाता है। एक ‘एचएमटी’ घड़ी थी जो कभी रुकती नहीं थी और एक हिंदी वाले ‘एचएमटी’ (हिंदी मीडियम टाइप्स) हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वो बढ़ते नहीं है। बहरहाल दो रोज़ पहले प्रधानमंत्री कह रहे थे कि उन्होंने चाय बेचते-बेचते हिंदी सीखी और आज हालत ये है कि हिंदी मीडियम से पढ़ा आदमी सोचता है कि इससे अच्छा तो मैं चाय बेच लेता, तो बेहतर रहता।

Saturday, August 1, 2015

अच्छे-बुरे, ताकतवर-कमज़ोर !


याकूब की फांसी की ख़बर के बाद से सामने आ रही बहुत सी टिप्पणियों से हैरत में भी हूं और दुखी भी। सदमा तो तब पंहुचा जब जिन युवा दोस्तों, भाइयों बहनों को सच्चा क्रांतिकारी समझता था वो भी ओवैसी और तोगरिआ की भाषा बोलने लगे। याकूब को फांसी हुई तो बेअंत और राजीव के हत्यारों को भी होनी चाहिए थी। ये बात बिल्कुल ठीक है। याकूब को फांसी नहीं होनी चाहिए थी इस पर बहस हो सकती है। मगर 257 लोगों की मौत का ज़िम्मेदार शख्स शहीद कैसे हो गया ये समझ से परे हैं। अगर मुम्बई धमाकों को मुम्बई दंगों की प्रतिक्रिया बताते हुए जायज़ ठहराया जा रहा है तो इसी तर्क पर गुजरात दंगें भी जायज़ हो गए क्योंकि वो भी गोधरा की प्रतिक्रिया में हुए थे। अगर आप गुजरात दंगों के गुनहगारों के लिए फांसी की मांग कर रहे हैं तो उसी सांस में याकूब के कृत्य को जायज़ बताते हुए उसे शहीद कैसे बता सकते हैं।
दूसरी बात ज़िम्मेदारी की। अगर आप याकूब की फांसी को आगे रखकर पूरे मुस्लिम समुदाय को पीड़ित बताते हुए और ‘एक याकूब मरा तो हज़ारों और पैदा हो जाएंगे’ लिख रहे हैं तो इससे क्या साबित करना चाहते हैं। इसकी प्रतिक्रिया सिर्फ आतंकवादी पैदा करेगी और कुछ नहीं। उसी तरह एक ही सांस में सभी मुसलमानों को लेकर गैरज़िम्मेदारी टिप्पणी कर देने से क्या हासिल होगा। हाँ ! "उन्हें" तो सदन की एकाध कुर्सी हासिल होगी, और हम "देश के भविष्यों" को "देश का अंधकारमय भविष्य। "  गुस्से में की गई कोई भी टिप्पणी सामने वाले को चितंन पर मजबूर नहीं करती बल्कि उसे ज़िद्दी बना देती है। और वो यही कहेगा मानते रहो जो मानना है।
अब बात गैरबराबरी की। ये कहने में मुझे कोई हर्ज़ नहीं कि गैरबराबरी की बात करते वक्त हर वर्ग बहुत रूमानी हो जाता है। उसे अपनी पीड़ा, अपना दर्द सबसे न्यारा और सुनहरा लगता है। अगर इस देश में धर्म के आधार पर गैरबराबरी है तो क्या जाति के आधार पर नहीं है। भाषा के आधार पर, प्रांत के आधार पर, पैसे के आधार पर नहीं है। क्या मुस्लिम होने के कारण मकान न मिलने वालों का दर्द किसी भी रूप में मुम्बई जाकर ज़लील होने वाले यूपी और बिहार के लोगों से ज़्यादा है।
खुद दिल्ली में मैंने दसियों तरह के भेदभाव देखे और सहे हैं। भेद भाव से याद आया याकूब की फ़ासी पर देश के टॉप लेवल के दुखी लोगों में से एक अपने इंटेलेक्चुअल थरूर साहब ने तो अपनी प्रजा (वो भी हवाई जहाज के इकॉनमी क्लास वाले) को मवेशियों के केटेगरी में दाल दिया तो भैया हम हीरो स्प्लेंडर पर चलने वालों की तो कोई औकात ही नहीं। और एक समय जब ये "पालिसी  मेकर"  थे तब फ़ासी को ले कर इनकी इंसानियत तो कभी जागी नहीं। जब आप "ताकतवर" थे तब आपने "कमज़ोरों" को "कैटल क्लास" कहा था और अब जब आप "कमज़ोर" हो गए तब "इंसानियत" की दुहाई दोगे तो भला खुद ही सोचिये, कौन वो "जागरूक शक्श" होगा जो आपकी सुनेगा ?
मगर किसी भी तरह के भेदभाव की बात करते हुए आपकी इंटेशन, समस्या का हल खोजने की होनी चाहिए न कि हम संविधान की मूल आस्था में ही विश्वास खो बैठे। अगर ये मुल्क अल्पसंख्यकों के प्रति इतना ही निर्दयी होता तो दक्षिण भारत के छोटे से गांव में जन्मा एक गरीब मुसलमान भारत रत्न होते हुए देश का राष्ट्रपति नहीं बनता। नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जैसा बेहद मामूली पृष्ठभूमि से निकला इंसान आज देश का सबसे चहेता स्टार नहीं होता। इन लोगों का ज़िक्र इसलिए क्योंकि ये लोग सबसे निचले तबके से ऊपर उठकर आए हैं।
हर चीज़ को अल्पसंख्यक के चश्मे से देखने से क्या हासिल होगा। मुझे आज भी याद है अज़हर जब इंडियन टीम के कप्तान थे तो इन्ही अज़हर की मिसाल, संघ तक, अपनी शाखाओं में दिया करता था मगर यही अज़हर मैच फिक्सिंग में पकड़े जाने पर कहने लगे कि मुझे इसलिए फंसाया जा रहा है क्योंकि मै अल्पसंख्यक हूं। कश्मीर! (जो भारत का ही अंग है), वहां की आवाम सड़को पर आकर फिलिस्तीन के लोगों के हक के लिए तो सड़क पर आकर पत्थरबाज़ी करती है मगर वही कश्मीरी मुसलमान कश्मीरी पंड़ितों को उनके घरों से बेदखल कर देता है। जिस औवेसी के तर्कों को बहुत से लोग अपने फेसबुक स्टेटस में आगे रखकर अपना दर्द बांटते हैं यही औवेसी और उनका परिवार सालों तक हिंदुस्तानी हुकूमत के खिलाफ हथियार उठाने की अपील करता रहा है। अगर पंजाब सरकार बेअंत सिंह के हथियारों को फांसी न देकर राजनीति कर रही है तो अकबरूद्दीन औवेसी भी तो 15 मिनट पुलिस हटा लो फिर हम क्या करते हैं, कहकर राजनीति ही करते हैं न। और उस बयान पर सामने बैठे जो लोग ताली बजाने वाले थे, वे भी इसी देश के मुसलमान ही थे।
जामा मस्जिद के इमाम की मोदी से कोई भी शिकायत हो, मगर वो हैं तो हिंदुस्तानी नागरिक ही न। मगर ताजपोशी के कार्यक्रम में पाक प्रधानमंत्री को न्यौता देना और उन्हें न बुलाना क्या ये दुश्मन देश के सामने अपने देश के पीएम को नीचा दिखाने की कोशिश नहीं है।
ये दुनिया का दस्तूर है जहां जहां जो "ताकतवर" है वो ज़्यादती करता ही है। हम देश से समाज से "गैरबराबरी" की कितनी शिकायत कर लें मगर क्या ये सच नहीं कि सिर्फ अपनी शारीरिक मज़बूती या स्ट्रांग जैंडर होने के नाते हर धर्म में मर्दों ने औरतों को दबाया है। देश से गैरबराबरी की शिकायत करने वाले क्या इस बात का दावा कर सकते हैं कि उन्होंने अपने धर्म में औरतों को बराबरी का दर्जा दिया है। बराबरी छोड़िए, आप तो उन्हें उपभोग की वस्तु मानते हैं। क्यों किसने कहा, आपको ऐसा मानने के लिए। इसलिए क्योंकि आपके पास बाहुबल है इसलिए आपने नियम बना दिए। तो फिर समाज में जिसके पास संख्यबल या बाहुबल है और वो ज़्यादती करें, तो इतना हैरान मत हो। जिस केस में सलमान को ज़मानत मिली और उसे एक घंटे के लिए जेल नहीं जाना पड़ा उसमें 99.9 फीसदी आम लोगों को जेल हो जाती। वहां तो लोगों ने नहीं कहा कि सलमान इसलिए जेल नहीं गया क्योंकि उसे अल्पसंख्यक होने के कारण रियायत मिल गई। वही बात उसके पास पैसा है। महंगे से महंगे वकील है इसलिए वो ये कर पाया। वही "ताकत" जिसका मैने पहले ज़िक्र किया।
ये बात कहने का सिर्फ इतना मतलब है कि समस्या की जड़ और वजह समझिए। अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे मज़बूत और खुले लोकतंत्र में अश्वेत लोगों को आज तक गैरबराबरी की शिकायत है। हॉलीवुड में एक्ट्रेस भेदभाव की शिकायत करती हैं। पाकिस्तान जो कि बना ही धर्म के आधार पर था। वो बंगाली मुसलमानों को साथ नहीं रख पाया, बलूचिस्तान अलग होने की कगार पर हैं। पूरे सिंध और कराची का हाल सबके सामने हैं और दस फीसदी हिंदू आबादी का तो उसने सफाया ही कर दिया।
तमाम गैरबराबरी और बेहतर होने की कोशिश के बीच हिंदुस्तान की ये खासियत ये है कि हम खुलकर इसकी शिकायत तो कर सकते हैं। याकूब की फांसी को लेकर जिन लोगों ने पुरज़ोर विरोध किया उनमें ज़्यादतर हिंदू ही थे। मगर इस शिकायत में बस इतना ख्याल रखें कि साथ रहना और साथ चलना ही एक मात्र रास्ता है। और वो सिर्फ बातचीत से निकल सकता है। लगातार विमर्श से निकल सकता है। और विरोध में ऐसी बातें न करें जहां से किसी के लिए लौटकर आना मुमकिन न हो।
तो मित्र भोले भंडारी बात हिन्दू -मुसलमान, बिहारी -मराठी, भारतीय अमरीकी या पाकिस्तानी की नहीं, बात सिर्फ अच्छे-बुरे, ताकतवर-कमज़ोर की है। कुछ ठीक करना हो तो इन मुद्दों पर चर्चा करने और मेरे जैसा ये लम्बा चौड़ा ब्लॉग लिखने से अच्छा है, पढ़ो लिखो मेहनत करो और शक्तिशाली बनो। सलमान जैसों की बेल कराने के लिए नहीं , फूटपाथ पर सोने वालों को इन्साफ दिलाने के लिए। यही तुम्हे बाकी हैवानों से अलग बनाएगा और आईने के सामने अपना सर गर्व से ऊँचा उठाने लायक भी। 

Thursday, June 25, 2015



फेसबुकिया Revolutionaries

मैं "सलाम" करता हूँ उन लोगों को जिनकी ज़िन्दगी हर तरह से झंड और बर्बाद होने के बावजूद, वो हर वक़्त फेसबुक और यहाँ वहां पर दुनिया को किसी न किसी बात पर लानत दे रहे होते हैं। ये वो लोग होते हैं जिन्हे 10 बार हाथ हिलाने पर इनकी गली में भी कोई रिक्शावाला तक देख कर रिक्शा नहीं रोकता और फेसबुक पर बराक ओबामा, नरेंद्र मोदी, नवाज़ शरीफ और बग़दादी तक को ये कह कर धमकियां दे रहे होते हैं की "अब भी वक़्त है सुधर जाओ!" 

इधर ये कहाँ गए मेरे 15 लाख नाम से फेसबुक पर पोस्ट डाल कर मोदी जी से हिसाब मांगने वाले घर का door bell बजते ही बच्चों को कह देते हैं की बउआ! दूध वाला हिसाब करने आये तो कह देना की पप्पा बोल बम गए हैं भोला बाबा का दर्शन करने।

इनमें कुछ वो भी हैं जो विद्यालय में बैठ कर गिरती शिक्षा व्यवस्था पर चिंता करते पाये जाएंगे पर जाड़े के दिनों में यही होते हैं जिन पर पति केलिए स्वेटर बुनते रहने और स्कूल के बेंच कुर्सी को जला कर आग तापने का इलज़ाम लगता आया है। 
भरी मेट्रो में 5 से 6 लाचार सी दिखने वाली सवारियों को पकड़ कर ये उन्हें बताएँगे की कैसे अगर अरुण जेटली मेरे advice पर चले तो अर्थव्यवस्था को इस हफ्ते के अंत तक ही 4 से 8 फीसदी तक पहुंचा सकता है, विदेशी मुद्रा भण्डार में 300 - 400 अरब डॉलर और जोड़ सकता है। और फिर शाम को घर जा कर 3 घंटे बीवी से इस बात केलिए झगड़ रहे होते हैं की उसने जो उसकी पैंट बिना check किये धो दिया है उसमें 10 रुपये का एक नोट था और साथ में निर्मल बाबा द्वारा धन वृद्धि के लिए दिया हुआ मंत्र का एक पर्चा। 

फेसबुक पर ये सीरीज हारने पर धोनी को लानत और सलाह दे रहे होते हैं। रोहित शर्मा को ये बता रहे होते हैं की कैसे उसके बैट और पैड के बीच में जो गैप छूट जा रहा है वो उसी के वजह से बार बार LBW हो जा रहे। वहीँ खुद उन्हें गली के क्रिकेट टीम में भी इस शर्त पर लिया जाता है की "देख भाई ! एक ही शर्त पर खेलेगा तू , शॉट कोई भी मारे, बॉल नाली में या वर्मा अंकल के कंपाउंड में जाएगा तो लाएगा तू ही। 

ये वो लोग हैं जो कट्टरता से आहात हो कर फेसबुक पर ये सवाल करते हैं की दुनिया में इतनी नफरत इतना ज़हर क्यों है। और इनके पोस्ट करने के दौरान बीवी आवाज़ लगा कर अगर कह दे की "अजी सुनते हो ! तनी पर कपडा अगर सुख गया हो तो ज़रा ला देना !" तो इनके मुह से पहली बात ये निकलती है की "इस औरत ने तो मेरी ज़िन्दगी में ज़हर घोल रखा है!"

Tuesday, April 7, 2015

मैं (लेखक/पत्रकार) बिका हुआ हूँ !



कोई लेखक अपनी लेखनी में अगर लगातार निष्पक्ष लग रहा है तो आप उससे सीधे पूछ सकते हैं-क्यों भाई, लाइन बदलने की सोच रहे हो क्या? और वो भी सीधे जवाब दे देगा-हां यार, सोच रहा हूं प्रॉपर्टी डीलिंग का काम कर लूं या किसी प्राइमरी स्कूल के बाहर गैस वाले गुब्बारे बेचने लगूं। ऐसा इसलिए क्योंकि निष्पक्षता आज की तारीख में चुनाव नहीं, आपके इंतज़ार और निक्कमेपन को बताता है। मतलब अपनी लेखनी से आप आज तक किसी को "कंवींस" नहीं कर पाएं कि ज़रूरत पड़ने पर आप उनका पक्ष या उनके विपक्षी की ठीक से बखियां उधेड़ सकते हैं। इस रूप में आजकल मैं भी खुद को निकम्मा मानने लगा हूं। बड़ी ईर्ष्या होती है ये सुनकर फलां पत्रकार उस पार्टी के हाथों "बिका" हुआ है। खुद को न बेच पाना पत्रकार को आत्मसंशय में डाल देता है। वो सोचने लगता है कि मेरे प्रयासों में क्या कमी रह गई। क्या मैं उतना "काबिल" हूं भी या नहीं? उसे शक होता है कि कहीं विरोधियों ने बाज़ार में उसके "ईमानदार" होने की अफवाह तो नहीं फैला दी। ऐसा है, तो मैं साफ कर दूं कि सुन-सुनाई बातों में न आएं। मेरे लेखकीय निष्पक्षता को मेरे "सिद्धांत" के रूप में नहीं, हर जगह संभावनाएं तलाशने की मेरी "कोशिश" के रूप में देखा जाए। इस निष्पक्षता से न तो मेरा घर चल पा रहा है और न ही "फैन फॉलोइंग" बढ़ पा रही है। बीजेपी के खिलाफ लिखता हूं तो ‘सिकुलर’ कहलाता हूं, आप को टोकता हूं तो‘भक्त’ और कांग्रेस के खिलाफ कुछ भी लिखते ही बेरोज़गार मान लिया जाता हूं! लिहाज़ा सभी पार्टियों से गुज़ारिश है कि कोई भी दो-चार करोड़ रुपये मेरी तरफ बढ़ाकर मुझे निष्पक्षता की इस दलदल से निकाले। मैं भी करियर में अब सेटल होना चाहता हूं। पद को लेकर मेरी कोई बड़ी लालसा नहीं हैं। चाहें तो मैं पार्टी ज्वॉइनकर सीधे वहां भी काम कर सकता हूं या "पत्रकार रहते हुए भी कर्मठ कार्यकर्ता" की भूमिका निभा सकता हूं। इच्छुक पार्टियां ऑफर लैटर देने से दो घंटे पहले मुझे इसके बारे में सूचित करें ताकि आपके खिलाफ लिखे तमाम ट्वीटस में डिलीट कर सकूं। वरना दुश्मन ख्वामखां यहां-वहां उसके स्क्रीनशॉट दिखाकर हमारे मज़े लेते रहेंगे।

Wednesday, October 29, 2014


गिरता आत्मसम्मान

जब भी आप ऐसे प्रोफेशन में होते हैं जहां आपकी "credibility" आपकी "निष्पक्षता" होती है तो आपको इस बात को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है कि आप अपनी बात या व्यवहार से किसी के प्रति ज़्यादा स्नेह दिखाते प्रतीत न हो।

सालों तक क्रिकेट मैच देखने के दौरान मैंने कभी भी (एक-आध बार छोड़कर) किसी बड़े अंपायर को किसी खिलाड़ी से ज़्यादा हंसी मज़ाक करते, उसके कंधे पर हाथ रखते या ऐसी किसी मुद्रा में नहीं देखा जो उनके निष्पक्ष ओहदे की मर्यादा के खिलाफ हो। इसलिए जब पत्रकारों की प्रधानमंत्री के साथ सेल्फी खिंचवाने और उस पर इतराते हुए उसे ट्वीटर पर पोस्ट करते देखा, तो बेहद आपत्तिजनक लगा। पत्रकार होने के नाते आपको अपने प्रोफेशन की dignity का ख्याल रखना चाहिए था न कि प्रधानमंत्री द्वारा ऐसा करने पर ओतप्रोत हो जाना चाहिए था।

इस मौके पर मुझे केबीसी में आई उस महिला की याद आ गई जिसने शाहरूख के आगे बढ़कर खुद ही उसको गले लगाने पर उन्हें मना कर दिया था। स्टार होने के नाते शाहरूख को ये लग सकता है कि उनसे गले लगना किसी के लिए भी (चाहे वो औरतों ही क्यों न) बड़े फक्र की बात हो सकती है, मगर महिला (खासकर भारतीय महिला) होने के ये आपको भी decide करना है कि क्या आप ऐसा करने में सहज हैं। और अगर नहीं है, तो बिना इस संकोच के कि, सामने वाला बड़ा स्टार है, मना कर देना चाहिए था जैसा उस महिला ने किया...इसलिए अगर खुद मोदी ने ही पहल कर पत्रकारों के साथ सेल्फी खिंचवाना शुरू किया तो, जिन्हें ये बात आपत्तिजनक लगी भी, उन्हें खुद ही ऐसा करने से मना कर देना चाहिए था।

किसी झिझक में खिंचवा भी ली, तो उस पर इतराना नहीं चाहिए था। एक पत्रकार के नाते अगर आप किसी के पद या शख्सियत से इतने अभिभूत हैं कि उसके साथ फोटो खिंचवाना गर्व की बात मानते हैं तो ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि आपमें इतने पेशेवर ईमानदारी और नैतिक साहस होगा कि अगर कल को उसके खिलाफ कुछ लिखना पड़े, तो आप लिख देंगे।

शायद आज के दौर में आत्मसम्मान वो चिड़िया है, जिसे लुप्त हो चुकी पक्षियों की सूची में डाला जा चुका है। हम क्या हैं, कौन हैं, हमारी ज़िम्मेदारी क्या है अगर न पता हो तो वही तमाशा खड़ा होता है जो भारतीय संसद में बिल क्लिंटन से हाथ मिलाने को लेकर मची सांसदों की भगदड़ में मचा था। ऐसा लगा था कि मानों मंगलवार को मंदिर के बाहर फ्री की आलू-पूड़ियां लेने के लिए कुछ गरीब रिक्शेवालों मारामारी कर रहे हैं।

Sunday, July 27, 2014

भारतीय रेल का सफर / Suffer

ट्रेन पकड़ने के लिए हो घोड़ों की व्यवस्था !

जिस तरह रेलवे हम सब की ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है उसी तरह रेलवे की सफर से जुडी समस्याएं भी। ऐसे में सरकार जब रेलवे के आधुनिकरण की बात करती है तो मेरी रूह काँप जाती है। इसलिए मेरी सलाह है की बजाय इन समस्याओं को जड़ से खत्म करने केरेल मंत्रालय लोगों को इनसे निपटने की सुविधाएं दे। जैसे -

ट्रेन में "ब्रांडेडखाना देने के बजाय रेलवे खाने की थाली के साथ कागज़ पर उसकी रेसिपी और भोजनकी जन्मतिथि (जब वो बनाया गया थालिख कर दे ताकि बाद में इलाज के दौरान लोगों को डॉक्टर को ये बताने में आसानी हो की वो क्या खा कर बीमार पर थे। साथ ही थाली से अतिरिक्त 50 रुपये ले कर यात्रियों को ऐसे खाने से हो रही मौतों के लिए 10 लाख का जीवन बीमा किया जाए।

रेलवे पटरियों के नजदीक हल्का होने केलिए वेस्टर्न टॉयलेट्स की व्यवस्था की जाएइससे देश की छवि भी सुधरेगी और साथ ही ऐसे लोगों को भी आसानी होगी जिन्हे घुटनों की दर्द की वजह से बैठने में तकलीफ होती है।
किसी भी जगह की पहचान उसके एम्बिएंस यानी वातावरण से होती है। भारतीय रेलवे के मामले में ये पहचान उसके डिब्बे की बदबू है। इसलिए बजाय इस पहचान से छेड़छाड़ करने केरेलवे व्यवस्था करे की जिनकी बर्थ टॉयलेट के नज़दीक है,"सफरशुरू होते ही एनेस्थीसिया दे कर उनकी नाक को सुन्न कर दिया जाए ताकि 15 - 20 घंटे के लिए उनकी सूंघने की क्षमता चली जाए।

आखिरी समय में दौड़ कर ट्रैन पकड़ने वालों केलिए घोड़ों और शेयरिंग ऑटो की व्यवस्था की जाए। बार्गेनिंग के चक्कर में ट्रैन  छूट जाए इसलिए ऐसे ऑटो का मीटर से चलना अनिवार्य कर दिया जाए।
हर प्लेटफार्म पर मोटे मोटे गद्दे लगाए जाएँ ताकि ट्रेन की छत पर सफर कर रही सवारियां स्टेशन आते ही छत से सीधा इन गद्दों पर कूद रजनीकांत स्टाइल में घर जा पाएं और जिन्हे उचाई से कूदने में डर लगता है उनके लिए पैराशूट की व्यवस्था की जाए।

जैसा की आप सब जानते हैं की भारतीय रेल वक्त की कितनी "पाबन्दहै तो अगर ट्रेन समय से 6 घंटे  लेट देर रात को पहुचती है तो वैसे यात्रियों के सेफ्टी को ध्यान में रखते हुए निशुल्क पिक एंड ड्राप फैसिलिटी की व्यवस्था की जाएअगर किसी का ट्रेन लेट की वजह से इंटरव्यू छूट जाए तो उसकी रेलवे में नौकरीऔर अगर कोई किसी शादी या श्राद्ध के कार्यक्रम में  पहुंच पाये तो शादी तो दोबारा नहीं हो सकती लेकिन भारतीय रेल को 1000 रुपये प्लेट वाले खाने की व्यवस्था करनी चाहिए।