Sunday, February 16, 2014


दिल्ली सियासत पर मेरे अंदर के छुपे जज़्बात......

मित्रों ये देश ना टूटने जा रहा है ना लुटने जा रहा है। केजरीवाल ना प्रधानमंत्री बनने जा रहे और ना ही राहुल गाँधी को जनता इटली भगाने जा रही है। ना कश्मीर भारत से अलग होने जा रहा है ना असाम में किसी समुदाय को बहुमत मिलने जा रही है। घबराए मत कुछ दिन के लिए बीमार देश एंटी बायोटेक के सेवन में है। जी हाँ बीमार का इलाज़ हो रहा है। जो अपनी हैसियत और औकात भूल रहे हैं ..जो बे अंदाज़ हो रहे हैं ...उनको डाक्टर केजरीवाल नीचे की तरफ इंजेक्शन लगा रहे है (अब भले ही इसके पीछे उनकी मंशा जो भी हो). दिल्ली के नतीजे को इसी निगाह से देखें। चलिए हम सब पार्टी लाइन से ऊपर उठें और स्वीकार करें कि ये उपचार अभी ज़रूरी है। मित्रों क्या आप जानते है किस बदतमीजी से चिदंबरम पेश आते हैं? क्या राहुल के गुरूर का आपको अंदाजा है? घर के नौकर की तरह ये मातहत से बात करते हैं? मोदी तो मोदी ..उनके निजी सचिव ओ पी सिंह खुद को आर के धवन से कम नही समझते? अरुण जेटली का मतलब ना हो तो शायद नमस्कार का भी जवाब ना दे? शाहनवाज़ जैसे नेता का स्टाफ अपने घर से मिलने वालों को भगा देता है? सिब्बल और सलमान के दरवाज़े पर आम आदमी से कहीं ज्यादा पालतू कुत्तों की हैसियत है? अहमद पटेल दलाल और डीलरों के अलावा किसी को भाव नही देते? ट्वीट का वक्त इस देश की नेता विपक्ष के पास है पर वो देश के कितने गांव में पिछले ५ साल में गयी है जरा बताएं? प्रकाश जावडेकर जैसे दो टके के नेता का निजी जीवन सार्वजनिक हो जाए तो उनकी राजनीति ही खत्म हो जायेगी?
मायावती के ड्राइंगरूम में क्या कोई दलित बैठ सकता है? कमलनाथ के अभिमान की आप कल्पना कर सकते है ? किसी गरीब की कटी ऊँगली पर वो पे.....? महाराष्ट्र में तो नेता प्यास से मर रहे लोगों कि प्यास अपनी पे...ब से बुझाने कि बात कर देते हैं। दंगा पीड़ितों पे ध्यान न दे कर हमारे उत्तर प्रदेश के "प्रभावशाली" युवा मुख्यमंत्री सैफई महोत्सव में नग्न नाच का आनंद लेते हैं। अरे छोड़ो अब ! नेताओं की लिस्ट बहुत लंबी है ..और इससे बुरा हाल सुब्रत राय, मुकेश अम्बानी और माल्याओं का है जिन्होंने भ्रष्ट और गैर कानूनी तरीके से अकूत संपत्ति हथिया के अधिशासी तंत्र से बलात्कार किया है ? मुझे खुशी है एक अदने से केजरीवाल ने इन सब मठाधीशों को उनकी औकात बता दी है(अब चाहे इसके पीछे कि उनकी मंशा जो भी रही हो या फिर वो किसी के मोहरे ही रहे हों)
यही इस देश की ताकत है। इसलिए मेरे प्यारे देशवासियों! दिल्ली कि आप कि सरकार के हाफ सेंचुरी से २ दिन कम के कार्यकाल और केजरीवाल जी के "मौकापरस्ती" वाले इस्तीफे से  घबराएं  नही, इस पुरे घटनाक्रम को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें। "आप" कोई "नक्सल आंदोलन" या "सरकार चला पाने वाली मशीन" नही है, और ना ही “फ्री पानी कि सुविधा देने वाली टंकी” या “मुफ्त कि बिजली पैदा करने वाली टरबाईन”। इसे एक "दबाव समूह" के रूप में देखें जो सत्ता और सत्ताधारी लोगों को उसकी "हैसियत" बता रहा है। अगर ये नेता तंत्र सबक लेकर खुद को ठीक कर लें तो इस से बेहतर देश के लिए कुछ नही और इस सबक से हमारा देश वाकई में महान बन सकता है। कुछ समझ आया चिदंबरम साहब?