हिंदी बोलिए त फाइन कर देता है !
हिंदी दिवस हिंदी भाषियों के लिए रोना रोने का मौका बनकर रह गया है। जबकि ज़रूरत इस बात की है कि दुनिया को हिंदी भाषा की महानता के बारे में बताया जाए। उन गुणों के बारे में बताया जाए जो किसी और भाषा में नहीं है। जैसे-
उदारता - पूरी दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां लोग अपनी मातृ भाषा के लिए गर्व से कहते हैं कि मुझे हिंदी नहीं आती। मैं हिंदी अखबार नहीं पढ़ता। जहां एक-दूसरे को ‘हिंदीवाला’ कहकर टोंट मारते हैं। एक दिन बोरिंग रोड पटना के एक ऑटो रिक्शा में एक पूजनीय आंटी जी को दूसरी आंटी से कहते सुना (गर्व से) "अरे जानती हैं मेरा गोलुआ का स्कूल तो गज़ब है एकदम ! हिंदी बोलिए त फाइन कर देता है !" अब ये हिंदी भाषा की उदारता नहीं तो क्या है, जो अपने ही लोगों का अपना मज़ाक उड़ाने की इतनी छूट देती है।
मूर्खों की निशानदेही - किसी भी समाज में सबसे बड़ी चुनौती वहां के बुद्धिजीवी खड़ी करते हैं। भारतीय समाज में हिंदी भाषी को सिरे से मूर्ख मान लेने से ये बौधिक प्रतिस्पर्धा काफी कम हो गई है। एक तो वैसे भी मौके बहुत कम है ऐसे में अंग्रेज़ी न जानने को ‘अयोग्यता’ न माना जाता, तो सोचिए ज़रा, नौकरियों के लिए कितनी मारकाट मचती।
गालियों की भाषा - किसी भी इंसान की असली भाषा वो होती है जिसमें वो गालियां देता है। इस लिहाज़ से देखा जाए तो हिंदी भाषा को अभी कुछ हजार साल तक और कोई हिलाने वाला नहीं। अब तो मोदी जी ने भी बता दिया कि गुजरात मे व्यापारी भी झगड़ों में असर लाने के लिए हिंदी में बोलने लगते हैं। हमने विज्ञान, तकनीक, आईटी की भाषा भले ही अंग्रेज़ी बना दी हो मगर आज भी बड़े-से बड़ा आदमी भी गुस्से के चरमपलों में जब तक हिंदी भाषा में सामने वाले के पारिवारिक सदस्यों को याद न कर ले, तब तक उसे चैन नहीं आता।
हिंदी का ब्रांड - भारत में देसी-विदेशी इतनी भाषाएं बोली जाती हैं मगर उन्हें बोलने वालों को ब्रांड का दर्जा हासिल नहीं है। हिंदी भाषी इकलौता आदमी है जिसे ‘एचएमटी’ कहा जाता है। एक ‘एचएमटी’ घड़ी थी जो कभी रुकती नहीं थी और एक हिंदी वाले ‘एचएमटी’ (हिंदी मीडियम टाइप्स) हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वो बढ़ते नहीं है। बहरहाल दो रोज़ पहले प्रधानमंत्री कह रहे थे कि उन्होंने चाय बेचते-बेचते हिंदी सीखी और आज हालत ये है कि हिंदी मीडियम से पढ़ा आदमी सोचता है कि इससे अच्छा तो मैं चाय बेच लेता, तो बेहतर रहता।